s

आदिकाल की विशेषताएँ | प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

(435)     

आदिकाल को वीरगाथाकाल के नाम से भी जाना जाता है।

s

रीतिकाल की विशेषताएँ और धाराएँ | प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

(433)     

इस लेख में रीतिकाल के बारे में जानकारी दी गई है।

s

अर्थ के आधार पर वाक्य के प्रकार

(430)     

ऐसा सार्थक शब्द समूह जो व्यवस्थित हो तथा पूरा आशय प्रकट करता हो, वाक्य कहलाता है।

s

कहानी क्या होती है? | प्रमुख कहानीकार एवं उनकी कहानियाँ || उपन्यास और कहानी में अन्तर

(429)     

कहानी वह कथात्मक लघु गद्य रचना है जिसमें जीवन की किसी एक स्थिति का सरस सजीव चित्रण होता है।

s

संस्मरण क्या है? | प्रमुख संस्मरण लेखक एवं उनकी रचनाएँ

(424)     

'संस्मरण' का शाब्दिक अर्थ है– 'सम्यक् स्मरण'।

s

आत्मकथा क्या होती है? | प्रमुख आत्मकथा लेखक एवं उनकी रचनाएँ

(423)     

आत्मकथा हिन्दी साहित्य की वह गद्य विधा है, जिसमें लेखक अपनी स्वयं की कथा लिखता है।

s

निबन्ध क्या है? | निबन्ध का इतिहास || प्रमुख निबन्धकार एवं उनकी रचनाएँ

(422)     

यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है, तो निबन्ध गद्य की कसौटी है।

s

पत्र-साहित्य क्या है? | प्रमुख पत्र-साहित्य एवं उनके लेखक

(404)     

कलात्मक पत्र एक साहित्यिक विधा है।

s

प्रभुरुख पाइ कै, बोलाइ बालक घरनिहि – गोस्वामी तुलसीदास

(390)     

प्रस्तुत पद 'केवट प्रसंग' से लिया गया है।

s

रावरे दोषु न पायन को – गोस्वामी तुलसीदास

(387)     

प्रस्तुत पद 'केवट प्रसंग' से लिया गया है।

s

एहि घाटतें थोरिक दूरि अहै– गोस्वामी तुलसीदास

(385)     

प्रस्तुत पद्यांश 'केवट प्रसंग' नामक शीर्षक से लिया गया है।

s

नाम अजामिल-से खल कोटि – गोस्वामी तुलसीदास

(382)     

प्रस्तुत पद 'केवट प्रसंग' नामक शीर्षक से लिया गया है।

s

यह तन काँचा कुम्भ है – कबीर दास

(376)     

प्रस्तुत दोहा 'अमृतवाणी' नामक शीर्षक से लिया गया है।

s

यह संसार क्षणभंगुर है – जैनेन्द्र कुमार

(372)     

प्रस्तुत गद्यांश 'खेल' नामक कहानी से लिया गया है।

s

माटी कहै कुम्हार से – कबीर दास

(370)     

प्रस्तुत पद्यांश 'अमृतवाणी' नामक शीर्षक से लिया गया है।

s

कबीर दास का जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

(239)     

कबीर दास की एकमात्र प्रमाणिक रचना 'बीजक' है।

s

उपन्यास क्या है? | उपन्यास का इतिहास एवं प्रमुख उपन्यासकार

(237)     

प्रेमचन्द को उपन्यास-सम्राट कहा जाता है।

s

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' का जीवन परिचय

(235)     

अज्ञेय जी की सबसे बड़ी उपलब्धि सन् 1943 में संपादित 'तार सप्तक' है।

s

एकांकी क्या है? | एकांकी का इतिहास एवं प्रमुख एकांकीकार

(233)     

जयशंकर प्रसाद ने हिन्दी साहित्य की प्रथम एकांकी 'एक घूँट' की रचना की थी।

s

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

(231)     

जयशंकर प्रसाद का महाकाव्य 'कामायनी' हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।

s

सूरदास का जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

(228)     

सूरदास भगवान श्री कृष्ण की आराधना करते थे।

s

नाटक क्या है? | नाटक का इतिहास एवं प्रमुख नाटककार

(225)     

जब किसी कथा का रंगमंच पर अभिनेताओं द्वारा प्रदर्शन (अभिनय) किया जाता है, तो उसे नाटक कहते हैं।

s

गोस्वामी तुलसीदास– जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

(222)     

तुलसीदास का कहना था कि "श्री राम स्वामी है और तुलसी सेवक है।"

s

नई कविता– विशेषताएँ एवं प्रमुख कवि

(215)     

प्रयोगवादी कविताओं ने आगे चलकर नई कविताओं का रूप ले लिया।

s

प्रयोगवाद– विशेषताएँ एवं महत्वपूर्ण कवि

(211)     

प्रयोगवादी कवि नवीन राहों के अन्वेषी हैं।

s

प्रगतिवाद– विशेषताएँ एवं प्रमुख कवि

(209)     

राजनीति के क्षेत्र में जो साम्यवाद है, साहित्य के क्षेत्र में वही प्रगतिवाद है।

s

रहस्यवाद (विशेषताएँ) तथा छायावाद व रहस्यवाद में अंतर

(206)     

चिंतन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है, भावना के क्षेत्र में वही रहस्यवाद है।

s

छायावाद– विशेषताएँ एवं प्रमुख कवि

(205)     

"स्थूल के प्रति सूक्ष्म के विद्रोह" को छायावाद कहा जा सकता है।

s

मैथिलीशरण गुप्त– कवि परिचय

(199)     

मैथिलीशरण गुप्त को 'राष्ट्र कवि' की उपाधि प्रदान की गई थी।

s

हिन्दी का इतिहास– द्विवेदी युग (विशेषताएँ एवं कवि)

(188)     

द्विवेदी युग के प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं। उन्होंने 'सरस्वती' पत्रिका का संपादन किया था।

s

हिंदी का इतिहास– भारतेन्दु युग (विशेषताएँ एवं प्रमुख कवि)

(185)     

भारतेंदु युग को आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रथम युग माना जाता है।

s

भज मन चरण कँवल अविनासी– मीराबाई

(175)     

"मीरा के पद" भज मन चरण कँवल अविनासी। जेताई दीसे धरण गगन बिच, तेताइ सब उठि जासी।

s

छावते कुटीर कहूँ रम्य जमुना कै तीर– जगन्नाथ दास 'रत्नाकर'

(174)     

"उद्धव-प्रसंग" छावते कुटीर कहूँ रम्य जमुना कै तीर गौन रौन-रेती सों कदापि करते नहीं।

s

शब्द सम्हारे बोलिये– कबीरदास

(168)     

"अमृतवाणी" शब्द सम्हारे बोलिये, शब्द के हाथ न पाँव।

s

देखो मालिन, मुझे न तोड़ो– शिवमंगल सिंह 'सुमन'

(167)     

हम तुम बहुत पुराने साथी जगती के मधुबन में

s

जो जल बाढ़ै नाव में– कबीरदास

(163)     

"अमृतवाणी" जो जल बाढ़ै नाव में, घर में बाढ़ै दाम।

s

जो पूर्व में हमको अशिक्षित या असभ्य बता रहे– मैथिलीशरण गुप्त

(162)     

"महत्ता" जो पूर्व में हमको अशिक्षित या असभ्य बता रहे– वे लोग या तो अज्ञ हैं या पक्षपात जता रहे।

s

आए हौ सिखावन कौं जोग मथुरा तैं तोपै– जगन्नाथ दास 'रत्नाकर'

(161)     

"उद्धव-प्रसंग" आए हौ सिखावन कौं जोग मथुरा तैं तोपै ऊधौ ये बियोग के बचन बतरावौ ना।

s

कबीर कुसंग न कीजिये– कबीरदास

(155)     

"अमृतवाणी" कबीर कुसंग न कीजिये, पाथर जल न तिराय।

s

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास– आधुनिक काल

(151)     

माना जाता है कि आधुनिक हिंदी कविता का आरंभ संवत् 1900 से हुआ था। इस अवधि के दौरान हिंदी कविता एवं साहित्य का चहुँमुखी विकास हुआ।

s

सुनि सुनि ऊधव की अकह कहानी कान– जगन्नाथ दास 'रत्नाकर'

(150)     

"उद्धव-प्रसंग" सुनि सुनि ऊधव की अकह कहानी कान कोऊ थहरानी कोऊ थानहि थिरानी हैं।

s

कबीर संगति साधु की– कबीर दास

(146)     

"अमृतवाणी" कबीर संगति साधु की, जो करि जाने कोय।

s

भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की– जगन्नाथ दास 'रत्नाकर'

(144)     

"उद्धव-प्रसंग" भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की सुधि ब्रज-गाँवनि में पावन जबैं लगीं।

s

सखी री लाज बैरन भई– मीराबाई

(142)     

"मीरा के पद" सखी री लाज बैरन भई।
श्री लाल गोपाल के संग, काहे नाहिं गई।

s

मीराबाई– कवि परिचय

(139)     

मीराबाई ने अपना संपूर्ण जीवन गिरधर गोपाल को समर्पित कर दिया था। उनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

s

आचार्य केशवदास– कवि परिचय

(135)     

केशव को 'आचार्य' कहकर संबोधित किया जाता है। उनको हिंदी जगत के 'कठिन काव्य के प्रेत' के नाम से जाना जाता है।

s

बाल्हा मैं बैरागिण हूँगी हो– मीराबाई

(133)     

"मीरा के पद" बाल्हा मैं बैरागिण हूँगी हो। जो-जो भेष म्हाँरो साहिब रीझै, सोइ सोइ भेष धरूँगी, हो।

s

मो देखत जसुमति तेरे ढोटा, अबहिं माटी खाई― सूरदास

(131)     

"सूर के बालकृष्ण" मो देखत जसुमति तेरे ढोटा, अबहिं माटी खाई। यह सुनिकै रिस करि उठि धाई, बांह पकरि लै आई।

s

मैया, मोहिं दाऊ बहुत खिझायो― सूरदास

(130)     

"सूर के बालकृष्ण" मैया, मोहिं दाऊ बहुत खिझायो। मोसों कहत मोल को लीनो, तोहि जसुमति कब जायो।

s

बानी जगरानी की उदारता बखानी जाइ― केशवदास

(128)     

"सरस्वती-वंदना" बानी जगरानी की उदारता बखानी जाइ, ऐसी मति उदित उदार कौन की भई।

s

मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी― सूरदास

(123)     

"सूर के बालकृष्ण" मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी। किती बार मोहि दूध पिअत भई, यह अजहूँ है छोटी।

s

मैया मैं नाहीं दधि खायो― सूरदास

(121)     

"सूर के बालकृष्ण" मैया मैं नाहीं दधि खायो। ख्याल परे ये सखा सबै मिलि, मेरे मुख लपटायो। देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचे धर लटकायो। तुही निरखि नान्हे कर अपने, मैं कैसे करि पायो।

s

बीती विभावरी जाग री― जयशंकर प्रसाद

(119)     

"गीत" बीती विभावरी जाग री। अम्बर-पनघट में डुबो रही- तारा-घट ऊषा-नागरी।

Categories

Subcribe