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कबीला किसे कहते हैं? | कबीलाई संगठन– कुल, ग्राम, विश, जन और राष्ट्र

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कबीले की परिभाषा

कबीले का शाब्दिक अर्थ 'कुल' होता है। ऋग्वेद के समय (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.) में अनेक ग्राम के लोग संगठित होकर एक बड़े समूह के रूप में रहते थे। इस समूह के सभी लोगों के रहन-सहन के तौर-तरीके, खान-पान, जीवन शैली आदि समान होते थे। इस समूह को 'कबीला' कहा जाता था। ऋग्वैदिक काल में समाज का प्रशासन कबीलाई संगठन पर आधारित था। इन कबीलों में रहने वाले लोग 'आर्य' थे। इन्हें 'पंचजन' भी कहा जाता है। ऋग्वैदिक काल में आर्यों के पाँच कबीले थे। इन कबीलों के नाम निम्नलिखित हैं–
1. अनु
2. द्रुहु
3. पुरू
4. तुर्वस
5. यदु।

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कबीले का प्रशासन

ऋग्वैदिक काल में राजतंत्रात्मक शासन प्रणाली के द्वारा शासन किया जाता था। साथ ही कुछ स्थानों पर गणतांत्रिक व्यवस्था के द्वारा भी शासन किया जाता था। आर्यों की कबीलाई व्यवस्था के अन्तर्गत पाँच प्रशासनिक इकाइयाँ थीं। ये प्रशासनिक इकाइयाँ निम्नलिखित थीं–
1. कुल (परिवार)– परिवार का मुखिया 'कुलप' अथवा 'गृहपति' होता था।
2. ग्राम– अनेक परिवारों से ग्राम का निर्माण होता था। ग्राम के मुखिया को 'ग्रामणी' कहा जाता था।
3. विश– अनेक ग्राम मिलकर विश बनाते थे। विश के प्रधान को 'विशपति' कहा जाता था।
4. जन– अनेक विश मिलकर जन बनाते थे। जन के प्रधान को 'जनपति' कहा जाता था।
5. राष्ट्र– कई जन मिलकर राष्ट्र बनाते थे। यह राष्ट्र कबीलाई संगठन होता था। इसका प्रमुख 'राजा' होता था। इसे 'गोप' कहा जाता था। गोप का सम्पूर्ण कबीले पर नियन्त्रण होता था।

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कबीले का राजा (गोप)

ऋग्वेद में कबीले के राजा (गोप) को 'गोप्ता जनस्य' अर्थात् कबीले का संरक्षक और 'पुराभेत्ता' अर्थात् नगरों पर विजय प्राप्त करने वाला कहा गया है। राजा भूमि का स्वामी नहीं होता था। भूमि का स्वामित्व प्रजा में निहित होता था। प्रजा द्वारा राजा को स्वेच्छा से कर दिया जाता था। इस कर को 'बलि' कहा जाता था। प्रजा से बलि लेने के बदले राजा उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेता था। राजा के पास नियमित सेना नहीं होती थी। युद्ध के समय वह नागरिक सेना संगठित कर लेता था। इस सेना के संचालन का कार्य व्रात गण, ग्राम और सर्ध नामक टोलियाँ करती थीं।

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दश राज्ञ युद्ध

दश राज्ञ युद्ध का शाब्दिक अर्थ 'दश राजाओं के साथ युद्ध' होता है। यह युद्ध परूष्णी (रावी) नदी के तट पर भरत वंश के राजा सुदास और दश जनों के मध्य हुआ था। युद्ध में भाग लेने वाले इन दश जनों के अन्तर्गत पाँच आर्य और पाँच अनार्य शामिल थे। अन्त में इस युद्ध में भरत वंश के राजा सुदास की विजय हुई थी। इस युद्ध का ऋग्वेद में विस्तृत उल्लेख मिलता है।

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सभा, समिति और विदथ

ऋग्वैदिक काल में अनेक जनतांत्रिक संस्थाओं का विकास हुआ। इन संस्थाओं के अन्तर्गत सभा, समिति और विदथ प्रमुख थीं। इन संस्थाओं में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक विषयों पर चर्चाएँ की जाती थीं। ऋग्वेद के समय में स्त्रियाँ भी राजनीति में भाग लेती थीं। सभा और विदथ में स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी होती थी। गोप (राजा), सभा और समिति से परामर्श प्राप्त करता था। सभा में श्रेष्ठ और संभ्रात लोग होते थे। इसके विपरीत समिति में सामान्य प्रजा के लोग भी शामिल हो सकते थे। समिति केन्द्रीय राजनीतिक संस्था होती थी। यह संस्था राजा की नियुक्ति, पदच्युत करने और उस पर नियन्त्रण रखने का कार्य करती थी। स्त्रियाँ भी समिति में भाग ले सकती थीं।

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(आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।)
Thank you.
R F Temre
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