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सम्राट हर्षवर्धन एवं उनका शासनकाल | Emperor Harshavardhana and his reign

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हर्ष के मूल तथा उत्पत्ति के विषय में जानकारी एक शिलालेख से प्राप्त होती है। यह वर्तमान गुजरात राज्य की गुन्डा जिले से प्राप्त शिलालेख है। हर्ष का जन्म थानेश्वर (वर्तमान हरियाणा) में हुआ था। हर्षवर्धन के भाई राज्यवर्धन थे। उनके पिता का नाम प्रभाकरवर्धन थे। उनके पिता की मृत्यु के बाद राज्यवर्धन राजा बने। परंतु दुर्भाग्यवश मालव शासक देवगुप्त तथा गौड़ शासक शशांक ने उन्हें मार डाला। तत्कालीन समय में गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात उत्तर भारत में अराजकता की स्थिति बनी हुई थी। ऐसी स्थिति में हर्षवर्धन थानेश्वर शासक बने और उन्होंने राज्य को राजनीति स्थिरता प्रदान की।

Information about the origin and origin of Harsha is obtained from an inscription. This is an inscription obtained from Gunda district of present-day Gujarat state. Harsha was born in Thaneshwar (present day Haryana). Harshavardhana's brother was Rajyavardhan. His father's name was Prabhakarvardhan. Rajyavardhan became the king after his father's death. But unfortunately he was killed by Malav ruler Devagupta and Gauda ruler Shashanka. At that time, after the fall of the Gupta Empire, there was a situation of anarchy in North India. In such a situation, Harshavardhana became the ruler of Thaneshwar and he provided political stability to the state.

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हर्षवर्धन ने 606 ईस्वी से 647 ईस्वी तक शासन किया। 7वीं सदी की शुरुआत में अपने भाई राज्यवर्धन की मृत्यु होने पर उन्होंने थानेश्वर और कन्नौज के राज्य को संभाला। हर्ष के शासनकाल के पूर्व वर्धन वंश की राजधानी थानेश्वर थी। किंतु हर्ष ने उसे परिवर्तित कर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। वे अपने पिता के जेष्ठ पुत्र नहीं थे। किंतु अपने पिता और बड़े भाई की मृत्यु हो जाने के पश्चात उन्हें राज्य का शासन अपने हाथों में लेना पड़ा। हर्ष के बहनोई कन्नौज के शासक थे। बंगाल के शासक ने उनकी हत्या कर दी। तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हर्ष में कन्नौज को भी अपने अधीन कर लिया और अपने बहनोई की मृत्यु का बदला लेने के लिए बंगाल पर आक्रमण कर दिया। 612 ईस्वी उन्होंने में उत्तर भारत में अपना साम्राज्य सुदृढ़ कर लिया। तत्कालीन समय में उन्होंने पंजाब को छोड़कर शेष उत्तरी भारत पर शासन किया था। उन्होंने लगभग 41 वर्षों तक शासन किया। अपने शासनकाल में उन्होंने साम्राज्य का विस्तार पंजाब, जालंधर, नेपाल, कश्मीर और बल्लभीपुर तक कर लिया था। वे पूर्वी भारत में विजय प्राप्त करने में अधिक सफल हुए थे। उन्होंने मगध तथा संभवतः बंगाल को भी विजित किया था। किंतु उन्हें पूर्व की तरह अन्य स्थानों पर उतनी सफलता प्राप्त नहीं हुई थी। 620 ईस्वी में हर्ष ने नर्मदा नदी को पार किया और दक्कन की ओर आगे बढ़ने की कोशिश की। तब उनका सामना चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय से हुआ। इस युद्ध का उल्लेख 634 ईस्वी की ऐहोल प्रशस्ति में मिलता है।

Harshavardhan ruled from 606 AD to 647 AD. He took over the kingdoms of Thaneswar and Kannauj on the death of his brother Rajyavardhana in the early 7th century. Before the reign of Harsha, the capital of the Vardhan dynasty was Thaneshwar. But Harsha converted it and made Kanauj his capital. He was not the eldest son of his father. But after the death of his father and elder brother, he had to take the rule of the state in his own hands. Harsha's brother-in-law was the ruler of Kannauj. He was assassinated by the ruler of Bengal. Keeping in view the then circumstances, Harsha also subdued Kanauj and attacked Bengal to avenge the death of his brother-in-law. In 612 AD, he consolidated his empire in North India. At that time he ruled the rest of northern India except Punjab. He ruled for about 41 years. During his reign, he expanded the empire to Punjab, Jalandhar, Nepal, Kashmir and Balbhipur. They were more successful in conquering eastern India. He conquered Magadha and possibly even Bengal. But he did not get as much success in other places as before. In 620 AD Harsha crossed the river Narmada and tried to advance towards the Deccan. Then he encountered Chalukya ruler Pulakeshin II. The mention of this war is found in the Aihole Prashasti of 634 AD.

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हर्षवर्धन प्रशासनिक दक्षता, धार्मिक सहष्णुता और राजनयिक संबंध बनाने की योग्यता के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए थे। उन्होंने वहाँ अपने राजदूत को भेजा। उनके राजदूत ने चीनी राजाओं के साथ भारतीय आचार-विचारों का आदान-प्रदान किया। इससे तत्कालीन समय में दोनों देशों के मध्य अच्छे संबंध स्थापित हो गए थे।

Harshavardhan was famous for administrative efficiency, religious tolerance and ability to build diplomatic relations. He had established diplomatic relations with China. He sent his ambassador there. His ambassador exchanged Indian ethics with the Chinese kings. Due to this, good relations were established between the two countries at that time.

हर्षवर्धन ने 'प्रियदर्शिका', 'रत्नावली' और 'नागरानंद' नामक नाटिकाओं की रचना की थी। हर्षवर्धन की प्रिय मित्र प्रसिद्ध कवि बाणभट्ट थे। बाणभट्ट ने 'कादंबरी' की रचना की थी। वे हर्ष के दरबार में रहते थे। उन्होंने संस्कृत भाषा में हर्षवर्धन की जीवनी 'हर्षचरित' लिखी है। इसमें उन्होंने हर्षवर्धन की वंशावली देते हुए उनके राजा बनने तक का वर्णन किया है। चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के शासनकाल में ही भारत आया था। उसने हर्ष के शासन के समय की आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक स्थितियों का सजीव वर्णन किया है और उसने सम्राट हर्षवर्धन की प्रशंसा की है।

Harshavardhan composed the plays 'Priyadarsika', 'Ratnavali' and 'Nagaranand'. Harshavardhana's dear friend was the famous poet Banabhat. Banabhatta composed 'Kadambari'. He lived in the court of Harsha. He has written a biography of Harshavardhana in Sanskrit language 'Harshacharita'. In this, he has described the lineage of Harshavardhana till he became the king. Chinese traveler Hiuen Tsang came to India only during the reign of Harsha. He has given a vivid description of the economic, social and religious conditions during the reign of Harsha and has praised Emperor Harshavardhana.

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हर्षवर्धन के शासनकाल के प्रमुख कर भाग, हिरण्य और बलि थे। इसके अतिरिक्त उद्रंग और उपरिकर का भी उल्लेख मिलता है। हर्ष को बांसखेड़ा और मधुवन अभिलेख में 'परमसौगात' कहकर संबोधित किया गया है। बांसखेड़ा ताम्रपत्र, सोनीपत और नालंदा से प्राप्त मुहरों में उन्हें 'परममाहेश्वर' कहकर संबोधित किया गया है। उनके शासनकाल की एक प्रमुख घटना 'कन्नौज की परिषद्' है। कन्नौज की धर्म-परिषद् हर्ष के आयोजन का मुख्य उद्देश्य उन तमाम भ्रांतियों का निराकरण था, जो उस समय विभिन्न धर्मावलंबियों के समक्ष समस्या उत्पन्न कर रही थी। हर्ष अपने शासनकाल में हर पाँचवें वर्ष प्रयाग में एक दान वितरण समारोह आयोजित करते थे। इसे 'महामोक्ष परिषद्' के नाम से जाना जाता था।

The major taxes of Harshavardhana's reign were Bhag, Hiranya and Bali. Apart from this, mention of Udrang and Uparikar is also found. Harsha is addressed as 'Paramsaugat' in the Banskheda and Madhuvan inscriptions. He is addressed as 'Parammaheshwar' in the seals obtained from Banskheda copper plate, Sonipat and Nalanda. A major event of his reign is the 'Council of Kannauj'. The main objective of organizing Harsha, the Dharma Parishad of Kannauj, was to clear all those misconceptions, which were causing problems in front of different religions at that time. Harsha used to organize a donation distribution ceremony at Prayag every fifth year during his reign. It was known as 'Mahamoksh Parishad'.

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हर्ष स्वयं प्रशासनिक व्यवस्था में व्यक्तिगत रूप से रूचि लेते थे। सम्राट की सहायता करने के लिए एक मंत्री परिषद् का गठन किया जाता था। बाणभट्ट की रचना के अनुसार 'अवंति' युद्ध और शांति का सर्वोच्च मंत्री थे। इसके अतिरिक्त 'सिंहनाद' हर्ष के महासेनापति थे। बाणभट्ट के अनुसार हर्ष के शासनकाल में निम्नलिखित मंत्री एवं उनके पद थे-
1. अवंति- युद्ध तथा शांति के मंत्री
2. सिंहनाद- हर्ष की सेना के महासेनापति
3. कुंतल- अश्वसेना के मुख्य अधिकारी
4. स्कंदगुप्त- हस्तिसेना के मुख्य अधिकारी
5. लोकपाल- प्रांतीय शासक

Harsha himself took personal interest in the administrative system. A council of ministers was formed to assist the emperor. According to Banabhatta, 'Avanti' was the supreme minister of war and peace. Apart from this, 'Singhnaad' was Harsha's general. According to Banabhatta, the following ministers and their posts were during the reign of Harsha-
1. Avanti- Minister of War and Peace
2. Lioness- General of Harsha's army
3. Kuntal- Chief Officer of the cavalry
4. Skandagupta- Chief Officer of Hastisena
5. Lokpal- Provincial Ruler

हर्ष के समय से कन्नौज का राजनीतिक शक्ति के केंद्र के रूप में विकास हुआ था। तत्कालीन समय में यह परिस्थिति उत्तर भारत में 'सामंतयुग' के आगमन का सूचक थी। तत्कालीन समय में उच्च अधिकारियों को वेतन के रूप में भूमि अनुदान (जागीरें) प्रदान की जाती थी। भूमि देने की सामंती प्रथा हर्षवर्धन ने ही प्रारंभ की थी। हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात भारत एक बार फिर केंद्रीय सर्वोच्च शक्ति से वंचित हो गया था।

Kannauj developed as a center of political power from the time of Harsha. At that time, this situation was indicative of the advent of 'Feudal Age' in North India. At that time, land grants (jagirs) were provided to the higher officials as salary. The feudal system of giving land was started by Harshavardhana. After the death of Harshavardhana, India was once again deprived of the central supreme power.

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आशा है, यह जानकारी परीक्षा प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण होगी।
धन्यवाद।
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(आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।)
Thank you.
R F Temre
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