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चक्रवर्ती सम्राट राजा भोज | Chakravarti Samrat Raja Bhoj

चक्रवर्ती सम्राट राजा भोज | Chakravarti Samrat Raja Bhoj

मालवा के परमार शासक सिंधुराज के पुत्र भोज थे। उन्होंने 1000 ईस्वी से 1055 ईस्वी तक शासन किया। मध्य युग के प्रमुख शासकों में राजा भोज का महत्वपूर्ण स्थान है। राजा भोज कलम और तलवार बाजी के धनी शासक थे। तत्कालीन समय में मालवा के परमार राज्य की सांस्कृतिक और राजनैतिक दोनों ही दृष्टियों से अभूतपूर्व उन्नति हुई। राजा भोज के शासन काल की घटना के विषय में जानकारी प्रदान करने वाले आठ अभिलेख प्राप्त हुए हैं। ये अभिलेख 1011 से 1046 ईस्वी तक की जानकारी देते हैं। उदयपुर प्रशस्ति से राजा भोज की राजनैतिक उपलब्धियों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। उनका पहला संघर्ष कल्याणी के लिए चालुक्य शासकों के साथ हुआ था। शुरुआत में राजा को सफलता प्राप्त हुई, किंतु बाद में चालुक्य शासक जयसिंह द्वितीय से उन्हें परास्त होना पड़ा।

Bhoj was the son of Sindhuraj, the Parmar ruler of Malwa. He ruled from 1000 AD to 1055 AD. Raja Bhoj has an important place among the major rulers of the Middle Ages. Raja Bhoj was a wealthy ruler of pen and sword. At that time, the Parmar state of Malwa had made unprecedented progress both from the cultural and political point of view. Eight inscriptions providing information about the incident during the reign of Raja Bhoj have been received. These records give information from 1011 to 1046 AD. Udaipur Prashasti gives information about the political achievements of Raja Bhoj. His first conflict was with the Chalukya rulers for Kalyani. Initially, the king was successful, but later he had to be defeated by the Chalukya ruler Jai Singh II.

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राजा भोज ने लाट के शासक कीर्तिराज को परास्त किया था। उन्होंने कोकण प्रदेश के शिलाहार वंश के के शासकों को पराजित किया और इंद्रस्थ (वर्तमान उड़ीसा) को विजित किया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने चेदि वंश पर विजय प्राप्त करने में भी सफलता प्राप्त की थी। किंतु चंदेल शासक विद्याधर और चालुक्य शासक सोमेश्वर द्वितीय से उन्हें परास्त होना पड़ा। आगे चलकर चेदियों और चालुक्यों ने अपनी शक्ति को संगठित किया और राजा भोज की राजधानी पर हमला कर उनके साम्राज्य को ध्वस्त कर दिया।

Raja Bhoj defeated Kirtiraj, the ruler of Lat. He defeated the rulers of the Shilahar dynasty of Konkan region and conquered Indrastha (present-day Orissa). Apart from this, he had also succeeded in conquering the Chedi dynasty. But he had to be defeated by Chandela ruler Vidyadhar and Chalukya ruler Someshvara II. Later the Chedis and Chalukyas consolidated their power and attacked the capital of Raja Bhoja and destroyed their empire.

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राजा भोज कला के उदार संरक्षक और स्वयं बहुत बड़े विद्वान थे। भारतीय इतिहास में उनकी ख्याति व्याप्त है। उन्होंने अपनी राजधानी धार नगर में स्थापित की थी। यह तत्कालीन समय में विद्या और कला का प्रसिद्ध केंद्र था। उन्होंने कविराज की उपाधि धारण की थी। उनकी प्रमुख रचनाएँ श्रृंगार प्रकाश, प्राकृत व्याकरण, श्रृंगार मंजरी, कर्मशतक, भोजचंपू, तत्वप्रकाश, कृत्यकल्पतरु, शब्दानुशासन, राजमृगांक आदि हैं। राजा भोज ने धार में सरस्वती मंदिर और चित्तौड़ में त्रिभुवन मंदिर का निर्माण करवाया था। वे महान दानी, विद्वान और निर्माता थे। उनकी मृत्यु होने पर एक लोकोक्ति कही गई जो कि सत्य है- "भोज की मृत्यु से विद्या एवं विद्वान दोनों ही निराश्रित हो गए।"

Raja Bhoja was a liberal patron of the arts and himself a great scholar. His fame is pervasive in Indian history. He established his capital at Dhar Nagar. It was a famous center of learning and art in those times. He assumed the title of Kaviraj. His major works are Shringar Prakash, Prakrit grammar, Shringar Manjari, Karmashtak, Bhojchampu, Tatvaprakash, Kriyakalpataru, Shabdnushasan, Rajmrigank etc. Raja Bhoj got the Saraswati temple built at Dhar and the Tribhuvan temple at Chittor. He was a great donor, scholar and builder. On his death a proverb was said which is true- "Bhoj's death left both the scholar and the scholar destitute."

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आशा है, इस लेख की जानकारी परीक्षार्थियों के लिए महत्वपूर्ण एवं परीक्षा उपयोगी होगी।
धन्यवाद।
RF competition

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NanDaNi

RAndir Singh

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